जासूसी कहानियाँ





फेलू'दा के कारनामे 1/35

फेलू'दा दार्जिलिंग में

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        बँगला में भैया या भाई साहब के लिए ‘दादा’ शब्द का प्रयोग होता है- संक्षेप में ‘दा’। तो ‘फेलू’दा’ का अर्थ हुआ- फेलू भैया। ‘फेलू’ पुकार नाम है प्रदोष चन्द्र मित्र का, जो ढेर सारे जासूसी उपन्यास पढ़ लेने के बाद खुद शौकिया जासूसी के क्षेत्र में हाथ आजमाने का फैसला लेते हैं।

        उनका मौसेरा भाई तापस उनके साथ ही रहता है। वही हमें इन कहानियों को सुना रहा है। फेलू’दा तापस को ‘तोप्से’ कहकर बुलाते हैं।

        जासूसी कहानियों का यह ताना-बाना महान फिल्मकार सत्यजीत राय ने बुना था। 1965 से ’91 के बीच उन्होंने कुल 35 कहानियाँ लिखीं फेलू’दा के कारनामों की, जो बच्चों-किशोरों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक में समान रुप से लोकप्रिय हुईं। कुछ ज्यादा लोकप्रिय कहानियों का हिन्दी में अनुवाद हालाँकि हो चुका है, मगर यहाँ प्रयास है कि पहली से लेकर 35वें तक क्रमानुसार इन कहानियों का अनुवाद प्रस्तुत किया जा सके।
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फेलू'दा के कारनामे 2/35

बादशाही अँगूठी

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        फेलू’दा ने अपनी जासूसी की शुरूआत दार्जिलिंग से की थी, जिसमें उन्होंने एक धमकी भरे पत्र का अनुसन्धान किया था कि वह पत्र आखिर किसने लिखा।

        उसके मुकाबले उनका यह दूसरा कारनामा बहुत ही रोमांचक तथा जोखिम भरा है। जासूसी के इस पेशे में व्याप्त खतरों का अहसास इस बार उन्हें गहराई से हो जाता है। इसके अलावे ‘प्राइवेट डिटेक्टिव’ के रूप में उनकी ख्याति भी फैलने लगती है। अगले, यानि तीसरे कारनामे में हम पायेंगे कि जासूस की अपनी पहचान के साथ वे ‘विजिटिंग कार्ड’ बनवा लेते हैं और चौथे कारनामे से हमें उनके हाथों में रिवॉल्वर भी दिखने लगेगा।

        खैर, फिलहाल तो फेलू’दा के इस दूसरे कारनामे का आनन्द लिया जाय, जो लखनऊ से शुरू और हरिद्वार में समाप्त होता है; जिसमें बहुत सारे रोचक चरित्र हैं; हायना (लकड़बग्घा) की भयानक हँसी है; जहरीली मकड़ी का आतंक है; अन्त में रिवॉल्वर का एक धमाका है, और ये सारी घटनायें हीरे की एक बहुमूल्य अँगूठी के चारों तरफ घूमती है, जो कभी मुगल बादशाह औरंगजेब की उँगली में हुआ करती थी।
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फेलू'दा के कारनामे 3/35

कैलाश चौधरी का रत्न

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        फेलू’दा के कुल 35 कारनामों में से 17 को लघु उपन्यास और 18 को लम्बी कहानी की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस लिहाज से, फेलू’दा के पहले कारनामे‘फेलू’दा दार्जिलिंग में’ को कहानी तथा दूसरे कारनामे ‘बादशाही अँगूठी’ को उपन्यास की श्रेणी में रखा जायेगा। इसके बाद के दो कारनामे- यानि तीसरा और चौथा कारनामा- कहानी की श्रेणी में आयेंगे और फिर उसके बाद के लगातार तीन कारनामे उपन्यास की श्रेणी में आयेंगे।

        यह फेलू’दा का तीसरा कारनामा है, जो उनके गृहनगर कोलकाता में ही घटित होता है। यह साल है, 1967। अब एक प्राइवेट डिटेक्टिव के रूप में लोगों ने उन्हें जानना शुरू कर दिया है और उन्होंने भी इस हैसियत से अपना ‘विजिटिंग कार्ड’बनवा लिया है।

        कोलकाता में रहने वाले कैलाश चौधरी हैं तो एक वकील, मगर वे पुराने जमीन्दार परिवार से हैं और एक शिकारी के रूप में भी उनकी ख्याति है। उनके पास ‘ब्लू बेरिल’ नामक एक पत्थर है, जिसपर उनके भाई की लालची निगाह टिकी हुई है। इसी पत्थर के चारों तरफ इस बार की कहानी घूमती है।

        पहली बार यह कहानी सन्देश पत्रिका के 1967 के दुर्गापूजा विशेषांक (शारदीय अंक) में छपी थी।
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फेलू'दा के कारनामे 4/35

सियार देवता रहस्य

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        फेलू’दा का यह चौथा कारनामा भी कोलकाता में ही घटित होता है।

        प्राचीन मिश्र के एक देवता हैं- ऐनुबिस, जिनका धड़ मनुष्य का और सिर सियार का होता है। इन्हें मृत्यु का देवता माना जाता है।

        इनकी एक मूर्ती नीलमणि बाबू नीलामी में खरीदते हैं और उसके बाद से ही उन्हें प्राचीन मिश्र की चित्रलिपि में धमकियाँ मिलने लगती हैं। वे फेलू’दा से मदद माँगते हैं।

        ऐनुबिस की मूर्ति चोरी चली जाती है। नीलामी में नीलमणि बाबू के प्रतिद्वन्दी रहे प्रतुल बाबू के भी घर से प्राचीन मिश्र की कुछ कलाकृतियाँ चोरी चली जाती हैं।

        अब फेलू’दा को पता लगाना कि इन चोरियों के पीछे रहस्य क्या है?

        पहली बार यह कहानी 1969 में ‘सन्देश’ पत्रिका के ग्रीष्म अंक में प्रकाशित हुई थी।
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फेलू'दा के कारनामे 5/35

गैंगटोक में गड़बड़झाला

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        फेलू’दा का यह पाँचवाँ कारनामा सिक्किम की राजधानी गैंगटोक में घटित होता है। साल है, 1970। यह कारनामा बहुत ही रोमांचक है।

        कहानी में निशिकान्त सरकार नाम के एक किरदार हैं- अनुमान है कि इस किरदार को गढ़ने के बाद ही सत्यजीत राय साहब के मन में यह ख्याल आया होगा कि क्यों न ऐसा ही एक किरदार फेलू’दा और तोप्से की जोड़ी के सहयोगी के रुप में गढ़ा जाय, जो रोमांचक घटनाक्रमों के बीच-बीच में हास्य का भी पुट पैदा करे! …और फिर, फेलू’दा के अगले यानि छठे कारनामे (सोने का किला) से आविर्भाव होता है- लालमोहन गाँगुली, उर्फ ‘जटायु’ का, जो रहस्य-उपन्यासों के सफल लेखक होते हैं। इसके बाद के सभी कारनामों में जटायु शामिल रहते हैं और फेलू’दा की ‘तिकड़ी’ बन जाती है- ‘फेलू’दा-तोप्से-जटायु’।

        खैर, फिलहाल तो गैंगटोक में घटे गड़बड़झाले का रोमांच उठाया जाय। कहानी शेलवंकर की मृत्यु के इर्द-गिर्द घूमती है। पहली नजर में, उनकी मृत्यु का कारण भूस्खलन जान पड़ता है। लेकिन भूस्खलन में सिर्फ एक पत्थर का लुढ़कना? क्या यह वाकई ‘वन चान्स इन ए मिलियन’ मामला था? शेलवंकर के कोट की जेब से ‘यमन्तक’ की दुर्लभ मूर्ति कहाँ गायब हो गयी? यमन्तक, यानि मृत्यु के तिब्बती देवता, जिनके नौ सिर और चौंतीस हाथ होते हैं! निशिकान्त-जैसे सरल व्यक्ति को धमकियाँ क्यों? रहस्यमयी साधू शेलवंकर की आत्मा से सम्पर्क स्थापित कर इस मृत्यु को हत्या बताते हैं। फेलू’दा जाँच शुरु करते हैं, तो उनपर भी जानलेवा हमला होता है। आगे पढ़िये और रोमांचित होईये…

        एक खास बात- आवरण पर पिस्तौल थामे फेलू’दा की कलाकृति वास्तव में बँगला फिल्मों के अभिनेता सव्यसाची चक्रवर्ती की है, जिन्होंने फेलू’दा शृँखला की बहुत-सी फिल्मों (बेशक, बाँग्ला) में फेलू’दा का किरदार निभाया है।
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फेलू'दा के कारनामे 6/35

सोने का किला

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        बँगला में एक शब्द है- ‘जातिस्मर’। जातिस्मर उसे कहते हैं, जिसे अपने पिछले जन्म की याद हो। हिन्दी में इसके लिए कोई शब्द शायद नहीं है, इसलिए इसे हिन्दी में अपना लिया जाना चाहिए। खैर, फेलू’दा के इस छठे कारनामे की शुरुआत एक जातिस्मर बालक से होती है, जो रेत की बात करता है, ऊँटों की बात करता है, युद्ध की बात करता है और बात करता है- सोने के किले की! यह भी कहता है कि वह जिस घर में रहता था, उसके आँगन के एक कोने में हीरे-जवाहरात जमीन में गाड़ कर रखे गये थे।

        एक पैरा-साइकोलॉजिस्ट उस बालक को लेकर राजस्थान रवाना होते हैं और गड़े हीरे-जवाहरात की बात (अखबारों से) जान कर कुछ शातिर बदमाश उनके पीछे लग जाते हैं। खतरा भाँप कर बालक के पिता फेलू’दा के पास आते हैं और इस तरह फेलू’दा जा पहुँचते हैं जोधपुर, फिर वहाँ से जैसलमेर।

        सत्यजीत राय साहब की फेलू’दा-शृँखला में यह कहानी तीन कारणों से मील का पत्थर हैः

        एकः इस कहानी से ‘जटायु’ का प्रवेश होता है। इसके बाद के हर कारनामे में वे फेलू’दा और तोप्से के साथ रहते हैं। यूँ तो कहानी में वे रहस्य-रोमांच के बीच हास्य का पुट पैदा करते हैं, पर गहराई से देखा जाय, तो वे ”दोस्ती“ का एक आदर्श उदाहरण होते हैं। अब से ‘फेलू’दा-तोप्से’ की जोड़ी ‘फेलू’दा-जटायु-तोप्से’ की तिकड़ी में बदल जाती है।

        दोः इस कहानी से ‘सिधू ताऊजी’ (सिधू जेठा) का भी जिक्र प्रारम्भ होता है। वे एक चलते-फिरते ‘इनसाइक्लोपीडिया’ होते हैं। जब किसी विषय पर किसी विशेष जानकारी की जरुरत होती है, तब फेलू’दा बेखटके सिधू ताऊजी की शरण में हाजिर हो जाते हैं। ध्यान रहे, ये कहानियाँ उस जमाने की हैं, जब इण्टरनेट नहीं हुआ करता था। ऐसे में, एक जासूस के लिए चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया के सम्पर्क में रहना जरुरी था। शरलॉक होम्स के भी एक बड़े भाई हुआ करते थे- कहानियों में उनकी भी यही भूमिका हुआ करती थी।

        तीनः सत्यजीत राय ने फेलू’दा शृँखला की कई फिल्में बनायीं और इसकी शुरुआत ‘सोनार केल्ला’ से ही हुई थी। यानि इसी ‘सोने का किला’ से। कहानी 1971 की है और फिल्म भी उसी वर्ष बनी। फेलू’दा की भूमिका निभायी थी सौमित्र चैटर्जी ने, तोप्से की भूमिका में थे सिद्धार्थ चैटर्जी और जटायु की भूमिका सन्तोष दत्ता ने निभायी थी। यह फिल्म अमेरिका में भी प्रदर्शित हुई थी- Golden Fortress नाम से।
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फेलू'दा के कारनामे 7/35

ब्रीफकेस रहस्य

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        ब्रीफकेस के अन्दर की सारी चीजें तो मामूली नजर आ रही थीं, फिर इसे हथियाने के लिए फेलू’दा पर हमले क्यों हो रहे थे?

        किसी जमाने में ‘एयर इण्डिया’ अपने यात्रियों को उपहारस्वरुप ब्रीफकेस दिया करती थी- बहुतों के पास नीले रंग के ऐसे ब्रीफकेस हुआ करते थे। ऐसे ही दो ब्रीफकेसों के अदला-बदली की चक्करदार कहानी, जिसके चक्कर में फेलू’दा जा पहुँचते हैं शिमला, जहाँ इस वक्त हो रही थी बर्फबारी।
        पता चलता है कि रहस्य एक नहीं, बल्कि दो हैं- ‘दोनाला रहस्य’!

        1917 की एक मूल्यवान पाण्डुलिपि तथा एक कीमती रत्न के इर्द-गिर्द घूमता फेलू’दा का सातवाँ कारनामा...
       
        टिप्पणीः इस कहानी पर बनी बँगला फिल्म का क्लाइमेक्स या अन्त थोड़ा-सा अलग है। फिल्मांकन के लिहाज से मूल कहानी में छोटे-मोटे बदलाव होते ही हैं।  
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