विज्ञान कपोलकथाएं

प्रोफेसर शंकु

पूरा नाम- त्रिलोकेश्वर शंकु

    एक विलक्षण प्रतिभाशाली वैज्ञानिक एवं आविष्कारक। रहने वाले थे गिरिडीह के, जो आज झारखण्ड में है। दुनिया के बहुत-से वैज्ञानिकों, आविष्कारकों के साथ उनकी मित्रता थी और उनके साथ मिलकर उन्होंने विश्व के विभिन्न अँचलों में जाकर बहुत सारे अभियानों में भाग लिया। स्वयं भी प्रो. शंकु ने कई आश्चर्यजनक आविष्कार किये और दुनिया के कई वैज्ञानिकों को उनके आविष्कार एवं शोध में मदद की।

    प्रो. शंकु एकाएक लापता हो गये थे। वे कहाँ गये, पता नहीं; मगर पन्द्रह वर्षों बाद उनकी एक डायरी मिली। कैसे? सुन्दरवन में एक विशाल उल्कापिण्ड गिरा था, उसी के गड्ढे में! क्या उनकी डायरी पृथ्वी के बाहर सौर जगत के दूसरे ग्रह से आयी थी? तो क्या वे किसी दूसरे ग्रह पर बस गये? यह तय करना पाठकों का काम है।

    बाद में गिरिडीह स्थित उनके आवास में उनके कागजातों के बीच 21 और डायरियाँ मिलीं। प्रत्येक में आश्चर्यजनक अनुभवों का जिक्र था। सच पूछा जाय, तो रहस्य-रोमांच, भ्रमण-अभियान और विज्ञान कपोल-कथा के प्रेमियों के लिए ये डायरियाँ ‘गोल्ड-माईन’ हैं- सोने की खान!

    इन्हें कुल 38 किस्तों में प्रकाशित किया जायेगा।
(तस्वीर anandabazar.com से साभार)
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Shanku 1:

अन्तरिक्षयात्री की डायरी

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        एक वाक्य में कहा जाय, तो सत्यजीत राय महोदय की लेखनी, तूली तथा कल्पना शक्ति का चमत्कार है- प्रो. शंकु शृँखला की कहानियाँ। इन कहानियों को सिर्फ विज्ञान कपोल-कथायें नहीं कह सकते, क्योंकि इनमें आश्चर्यजनक वैज्ञानिक आविष्कारों, खोजों के साथ-साथ रहस्य-रोमांच और दुनिया भर के विभिन्न इलाकों में किये गये अद्भुत साहसिक अभियानों का भी समावेश है। रहस्य-रोमांच के मामले में तो प्रो. शंकु कहीं-कहीं जासूस फेलू’दा पर भी बीस पड़ते नजर आते हैं।

        प्रो. शंकु शृँखला की पहली कहानी (अन्तरिक्षयात्री की डायरी) सत्यजीत राय की ‘सन्देश’ बाल-पत्रिका में आश्विन-कार्तिक-अग्रहायण, 1368 बंगाब्द अंक (शारदीय अंक,1961) में छपी थी। समय के लिहाज से यह जासूस फेलू’दा शृँखला से पहले की बात है।

        ये कहानियाँ डायरी की शैली में हैं। कुल 38 कहानियाँ हैं। (इनके अलावे, 2 कहानियाँ अधूरी रह गयीं हैं।) कुछेक को छोड़ ज्यादातर का हिन्दी में अनुवाद नहीं हुआ है। इसलिए यह प्रयास किया जा रहा है।

        शुरु की दो-चार कहानियाँ भले बाल-पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गयी होंगी, मगर बाकी कहानियाँ ऐसी हैं, जो बच्चों के साथ बड़ों को भी रोमांचित कर देंगी! 
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Shanku 2:

प्रो. शंकु और मिस्र का आतंक

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         प्रो. शंकु के इस दूसरे अभियान के पाठक-पाठिकाओं से आग्रह होगा कि वे इसे पढ़ते समय, या पढ़ने के बाद कहानी में प्रयुक्त कुछ शब्दों को इण्टरनेट (गूगल) पर सर्च करें। उन्हें एक से बढ़कर एक रोचक जानकारियाँ मिलेंगी। उदाहरण के लिए वे शब्द हो सकते हैंः-

        पोर्ट सईद (Port Said), बुबासटिस (Bubastis), स्कैरब बीटल (Scarab Beetles), ममी (Mummy), बास्तेत् (Bastet), प्राचीन मिस्र का चतुर्थ राजवंश (Forth daynasty of encient Egypt), पैपायरस (Papyrus), हायरोग्लिफिक (Hyroglyphics) और गीजा का पिरामिड (Giza Pyramid)।

        पहली कहानी में यह जानकारी दी जा चुकी है कि मूल कहानी में प्रो. शंकु की बिल्ली का नाम ‘न्युटन’ है, जबकि अनुवाद में इसे बदलकर ‘क्युरी’ किया जा रहा है (स्त्रीलिंग नाम रखने के लिए- बँगला भाषा में स्त्रीलिंग-पुल्लिंग का भेद नहीं होता)। एक बदलाव इस दूसरी कहानी में भी किया जा रहा है। मूल रचना में बिल्ली को ‘नेफ्देत्’ देवी का अवतार बताया गया है, जबकि प्राचीन मिश्र से सम्बन्धित कुछ वेबपेजों से मिली जानकारी के आधार पर इसे बदलकर ‘बास्तेत्’ किया जा रहा है।

        यह कहानी सर्वप्रथम ‘सन्देश’ के वैशाख, 1370 बंगाब्द (मई-जून, 1963) अंक में प्रकाशित हुई थी।
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Shanku 3:

प्रो. शंकु और हड्डी

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        प्रो. शंकु शृँखला की इस तीसरी कहानी को शुरु करने से पहले सत्यजीत राय साहब ने एक प्राक्कथन लिखा है। उसे पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि इस कहानी (प्रो. शंकु और हड्डी) को शृँखला में दूसरे क्रमांक पर होना चाहिए और दूसरी कहानी (मिश्र का आतंक) को तीसरे क्रमांक पर। पर चूँकि मूल बँगला पुस्तक (प्रो. शंकु समग्र) में यह कहानी तीसरे क्रमांक पर है, इसलिए यहाँ भी इसे तीसरे क्रमांक पर ही रहने दिया गया है। ‘प्राक्कथन’ में प्रो. शंकु की बाकी 21 डायरियों के मिलने का जिक्र है।

        पहली बार यह कहानी ‘सन्देश’ (बँगला) बाल-पत्रिका के पौष’1370 बंगाब्द (दिसम्बर-जनवरी, 1963-64) अंक में प्रकाशित हुई थी।
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Shanku 4:

प्रो. शंकु और मैकाओ

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        यह कहानी पहली बार 1964 (बँगाब्द 1371) में ‘सन्देश’ पत्रिका के शारदीय अंक में प्रकाशित हुई थी।

        कहानी में प्रोफेसर शंकु अदृश्य होने वाली दवा पर शोध कर रहे होते हैं और एक अन्य शोधकर्ता इस फार्मूले को चुराने के लिए अनोखी तरकीब अपनाते हैं।
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Shanku 5:

प्रो. शंकु और अद्भुत पुतले

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        प्रोफेसर शंकु का यह पाँचवाँ अभियान स्वीडेन और नॉर्वे में घटित होता है।

        यह कहानी ऐसे मानव-पुतलों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बिलकुल वास्तविक जान पड़ते हैं।

        यह कहानी सर्वप्रथम सत्यजीत राय की बँगला बाल-पत्रिका ‘सन्देश’ के फाल्गुन 1371 बंगाब्द (तदनुसार, मार्च-अप्रैल 1964 ई.) में प्रकाशित हुई थी।) 
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Shanku 6:

प्रो. शंकु और गोलक रहस्य

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        आज अपने नौकर प्रह्लाद को भेजकर अविनाशबाबू को माइक्रोसोनोग्राफ दिखाने के लिए बुलवाने की सोच ही रहा था कि देखा, सज्जन खुद चले आ रहे थे।

        उनके चेहरे का हाव-भाव और उनका श्वांस-निश्वांस बता रहा था कि वे काफी उत्तेजित थे। मैं उस वक्त अपने यंत्र को एक खास वेवलेंथ पर सेट कर माली द्वारा बगीचे में घास काटे जाने की प्रतिक्रिया में घास की समवेत चीत्कार को सुन रहा था। अविनाशबाबू ने लैबोरेटरी में आकर अपनी छड़ी को लापरवाही से टेबल पर फेंका और टीन की कुर्सी पर धप्-से वे बैठ गये। फिर एक लम्बी साँस छोड़कर बोले, "आप यहाँ आलतू-फालतू कामों में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, और उधर मेरे घर में विचित्र घटनाएं घट रही हैं!"

        अविनाशबाबू का यह हिकारत वाला स्वर मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा। यथासम्भव गम्भीर स्वर में ही पूछा मैंने, "कैसी विचित्र घटनाएं?"

        "सुनना है, कैसी घटनाएं? मेरी वह गेन्द- याद है?"

        "है।"

        "हर घण्टे में रंग बदल रही है।"
        (कहानी से)
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